कपड़ों, पैकेजिंग और अन्य प्लास्टिक उत्पादों के माइक्रोप्लास्टिक इंसानों द्वारा खाए जाने वाली मछलियों में समा रहे हैं।
मानव स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाली यह जानकारी, यूएस की एक रिसर्च यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने दी है।
उन्होंने पर्यावरण में घुलने वाले माइक्रोफाइबर प्रदूषण को घटाने के लिए उचित कदम उठाने पर जोर दिया है।
पोर्टलैंड स्टेट यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञों ने मछलियों की छह प्रजातियों में मनुष्यों द्वारा उत्पादित या संशोधित सामग्रियों की जांच की थी।
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उन्हें ब्लैक रॉकफिश, लिंगकॉड, चिनूक सैल्मन, पैसिफिक हेरिंग, पैसिफिक लैम्प्रे और गुलाबी झींगे में माइक्रोप्लास्टिक मिले।
लैब टेस्ट में मछलियों के 182 नमूनों में से 180 में माइक्रोफाइबर प्रदूषण से जुड़े 1,806 संदिग्ध कण पाए गए।
गुलाबी झींगे में हानिकारक कणों का भंडार सबसे अधिक, लेकिन चिनूक सैल्मन, ब्लैक रॉकफिश व लिंगकॉड में कम थे।
विशेषज्ञ टीम ने छोटे समुद्री जीवों में मानव उत्सर्जित प्लास्टिक प्रदूषक कणों की अधिकता बताई।
माइक्रोफ़ाइबर के आंत और शरीर के अन्य हिस्सों में चले जाने के कारण यह अवस्था चिंताजनक मानी गई।
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इससे मनुष्य और अन्य जीवों के स्वास्थ्य पर व्यापक दुष्प्रभाव पड़ते है।
हालांकि, मानव जीवन में माइक्रोप्लास्टिक की घुसपैठ देखते हुए लोगों को समुद्री भोजन छोड़ने की सलाह नही है।
टीम का कहना था कि हम पर्यावरण में जो कुछ भी डालते हैं, वह हमारी प्लेटों में वापस आ जाता है।
इसलिए, माइक्रोप्लास्टिक छोड़ने वाले उत्पादों के उचित निपटान और उपयोग में सावधानी बरतने की आवश्यकता है।
यह स्टडी फ्रंटियर्स इन टॉक्सिकोलॉजी पत्रिका में प्रकाशित हुई थी।