भारत में बढ़ते वायु प्रदूषण से जनसंख्या की सेहत पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों की कोई विस्तृत जानकारी उपलब्ध नहीं है।
लेकिन एक स्कॉटिश स्टडी ने कई वर्षों तक वायु प्रदूषण में रहने से मानसिक और शारीरिक तकलीफों में वृद्धि के कारण अस्पतालों में भीड़ बताई है।
नतीजे देखते हुए स्टडी रिसर्चर्स ने अस्पतालों पर प्रदूषण संबंधी रोगों का भार घटाने के लिए सख्त पर्यावरणीय प्रतिबंधों की आवश्यकता कही है।
पहले हुई खोजबीन में वायु प्रदूषण वृद्धि से अस्पताल में भर्ती की बजाय प्रभावितों की मौत और मानसिक की बजाय शारीरिक दिक्क्त बताई गई थी।
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इस नई जानकारी के लिए रिसर्च टीम ने स्कॉटिश लॉन्गिट्यूडिनल स्टडी से जनसंख्या का हेल्थ डाटा लिया था।
विश्लेषण में कुल मिलाकर 17 वर्ष और उससे अधिक आयु के 202,237 लोगों का स्वास्थ्य हाल देखा गया।
वर्ष 2002 और 2017 के बीच, प्रत्येक वर्ष 4 प्रमुख प्रदूषकों से उनके स्वास्थ्य और दिल, सांस, संक्रामक एवं मानसिक रोगों के कारण अस्पताल में भर्ती होने का पता लगाया गया।
ट्रैफिक और उद्योगों से निकले 4 प्रदूषकों: नाइट्रोजन डाइऑक्साइड (NO2); सल्फर डाइऑक्साइड (SO2); 10 μm व्यास वाले प्रदूषक कण (PM10); और प्रत्येक व्यक्ति के घर के पास प्रति 1 किमी2 में 2.5 μm या उससे कम के छोटे कणों (PM2.5) की जांच की गई।
हैरानी नहीं थी कि दूषित हवा में सांस लेने वालों का अस्पताल में भर्ती होने की उच्च दरों से गहरा संबंध था।
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NO2, PM10 और PM2.5 की अधिकता से अस्पताल में दिल, सांस और संक्रामक रोगों के मरीज ज्यादा भर्ती थे।
PM2.5 व NO2 प्रदूषकों में प्रत्येक 1 μg/m3 की वृद्धि से सांस के रोगियों की अस्पताल में भर्ती होने की दर क्रमशः 4% और 1% से अधिक बढ़ी।
अस्पताल में भर्ती होने की अधिक संख्या SO2 (मुख्यत: श्वसन रोग से) और NO2 (मानसिक बीमारी/व्यवहार संबंधी दिक्कतें) से जुड़ी थी।
जांच में कई कमियों के बावजूद टीम ने कहा कि वायु प्रदूषण रोकथाम से स्कॉटलैंड के अस्पतालों पर बढ़ता बोझ घटाया जा सकता है।
विस्तारपूर्वक जानकारी BMJ Open में छपी रिपोर्ट से मिल सकती है।
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