फिट रहने और मांसपेशियां मजबूत रखने (Muscular Strength) से किसी भी कारण होने वाली मौत में कमी आ सकती है।
यह कहना है अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य वैज्ञानिकों की एक टीम द्वारा की गई नई स्टडी का।
स्टडी ने शारीरिक फिटनेस व मांसपेशियों की ताकत बढ़ाने से कैंसर रोगियों की मृत्यु दर (Cancer-specific mortality) में भी कमी कही है।
वैज्ञानिक टीम के मुताबिक, यह कमी 31% से 46% तक होने का अनुमान है।
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इस बारे में उन्हें 46694 लोगों पर हुए 42 अध्ययनों के विश्लेषण से नई जानकारी मिली है।
जानकारी में शारीरिक फिटनेस और मजबूत मांसपेशियों से स्वस्थ इंसानों की मृत्यु दर में भी 21% की कमी थी।
इसके अलावा, उनकी हृदय रोग और फेफड़ों की बीमारी से होने वाली मृत्यु दर में क्रमश: 15% और 27% की कमी थी।
मांसपेशियों की ताकत सहित कार्डियोरेस्पिरेटरी फिटनेस से किसी भी कैंसर तथा स्टेज के रोगियों में सभी कारणों और कैंसर-विशेष मृत्यु दर में महत्वपूर्ण गिरावट थी।
खासकर फेफड़ों और पाचन कैंसर के रोगियों पर विशेष रूप से सकारात्मक प्रभाव पाए गए।
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मांसपेशियों की बढ़ी हुई ताकत और कार्डियोरेस्पिरेटरी फिटनेस से कैंसर के एडवांस स्टेज पीड़ितों के जीवन में भी वृद्धि की संभावना थी।
टीम ने रोजाना एक्सरसाइज से बढ़ी हुई शारीरिक फिटनेस सभी इंसानों के लिए फायदेमंद बताई।
यहां तक कि कैंसर होने के बाद भी मांसपेशियों की ताकत और कार्डियोरेस्पिरेटरी फिटनेस में की गई वृद्धि फायदेमंद थी।
पाया गया कि कैंसर पता चलने के बाद मांसपेशियों की ताकत या कार्डियोरेस्पिरेटरी फिटनेस बढ़ाने से पीड़ित की उम्र बढ़ सकती हैं और मृत्यु दर कम हो सकती हैं।
तेज चलने, दौड़ने, तैरने या साइकिल चलाने जैसी एरोबिक एक्सरसाइज से कार्डियोरेस्पिरेटरी फिटनेस बढ़ा सकते है।
जबकि मांसपेशियों की ताकत को डंबल, बारबेल और बॉडी वेट जैसी एक्सरसाइज द्वारा बढ़ाया जा सकता है।
इसके लिए सभी इंसानों को सप्ताह में कम से कम तीन से पांच दिन एक्सरसाइज करनी चाहिए।
यह एक्सरसाइज व्यक्ति की शारीरिक क्षमतानुसार या लगभग 25 से 30 मिनट की होनी चाहिए।
गौरतलब है कि वर्ष 2022 में कैंसर के लगभग दो करोड़ नए मामले सामने आए थे।
इस दौरान दुनिया में कैंसर से 97 लाख मौतें हुईं, जो आने वाले दशकों में बढ़ने की आशंका है।
निष्कर्षों की मानें तो मांसपेशियों की ताकत और कार्डियोरेस्पिरेटरी फिटनेस सुधारने वाली एक्सरसाइज से कैंसर रोगियों की मृत्यु दर कम हो सकती हैं।
इस बाबत अधिक जानकारी ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में प्रकाशित स्टडी से मिल सकती है।